مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا
जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून के बदले या धरती में फ़साद फैलाने के अलावा किसी और वजह से क़त्ल किया, तो मानो उसने सारे इंसानों का क़त्ल कर दिया।
(सूरह 5, आयत 32)
Read moreयह आरोप कुरान की आयतों को उनके संदर्भ से बाहर निकालकर पेश करने का नतीजा है। कुरान आत्मरक्षा में या ज़ुल्म के खिलाफ़ लड़ने की इजाज़त देता है, लेकिन निर्दोष लोगों की हत्या की सख़्त मनाही करता है।
ऊपर दी गई आयत (5:32) स्पष्ट रूप से एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या को पूरी इंसानियत की हत्या के बराबर मानती है। यह आयत जीवन की पवित्रता पर ज़ोर देती है।
युद्ध से संबंधित आयतें एक विशिष्ट ऐतिहासिक संदर्भ में थीं, जहाँ शुरुआती मुसलमानों पर क्रूरतापूर्वक हमला किया जा रहा था। इन आयतों को शांति और सुलह को प्रोत्साहित करने वाली अन्य आयतों के साथ पढ़ा जाना चाहिए। इस्लाम में शांति, न्याय और क्षमा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
وَقَاتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ الَّذِينَ يُقَاتِلُونَكُمْ وَلَا تَعْتَدُوا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ
और अल्लाह के रास्ते में उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं, लेकिन ज़्यादती न करो। निःसंदेह अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता।
(सूरह 2, आयत 190)
وَإِن جَنَحُوا لِلسَّلْمِ فَاجْنَحْ لَهَا وَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ
और अगर वे सुलह की ओर झुकें, तो तुम भी उसके लिए झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो।
(सूरह 8, आयत 61)
