الضحى
Ad-Duha (प्रातःकाल ( चढ़ता दिन ))
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَـٰنِ الرَّحِيمِ
[ आरंभ ( शुरू ) ] अल्लाह के नाम से जो अत्यंत दयावान, निरंतर ( असीम ) दयाशील है ।
وَالضُّحَىٰ
कसम है चढ़ते दिन ( खिलती धूप ) की !
وَاللَّيْلِ إِذَا سَجَىٰ
और रात की, जब वह ( सन्नाटा पसारे ) स्थिर हो जाए !
مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ
[ हे मुहम्मद ﷺ ] तुम्हारे पालनहार ( रब ) ने ना तुम्हें छोड़ा, और ना अप्रसन्न हुआ।
وَلَلْآخِرَةُ خَيْرٌ لَّكَ مِنَ الْأُولَىٰ
और निश्चय ही आख़िरत ( बाद वाली अवस्था ) तुम्हारे लिए पहले ( प्रारंभिक / सांसारिक अवस्था ) से उत्तम है।
وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰ
और निश्चय ही शीघ्र तुम्हारा रब तुम्हें ( इतना ) प्रदान करेगा कि तुम प्रसन्न ( संतुष्ट ) हो जाओगे।
أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًا فَآوَىٰ
क्या ( उसने ) तुम्हें अनाथ नहीं पाया ? तो ठिकाना ( आश्रय ) दिया !
وَوَجَدَكَ ضَالًّا فَهَدَىٰ
और तुम्हें मार्ग से अपरिचित पाया, तो मार्ग दिखाया !
وَوَجَدَكَ عَائِلًا فَأَغْنَىٰ
और तुम्हें निर्धन पाया, तो समृद्ध कर दिया।
فَأَمَّا الْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْ
तो बहरहाल, ( तुम ) /तो/ अनाथ पर कठोरता ( दमन ) ना करना ।
وَأَمَّا السَّائِلَ فَلَا تَنْهَرْ
और जहां तक बात है, मांगने वाले ( याचक ) की तो ( उन्हें ) ना झिड़कना ।
وَأَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ
और रही बात, तुम्हारे रब की कृपा ( नेमत ) की तो चर्चा करना।
